चन्द्रा, देहरादून

कभी कभी में सोचती हूँ….
मैं अकेले सफर कर रही होती तो मैं लिखती,
लिखती उन तमाम एहसासों के बारे में….
मैं लिखती ढलते सूरज की खूबसूरती में
खुद को सराबोर करने की खुशी….
मैं लिखती चलते हुए पीछे छूटते
चीड़ की कतारों की छांव में
खुद की परछाई देखने की खुशी और
महसूस करना कि अपना साथ
कभी कितना खूबसूरत लगता है,
मैं लिखती इन ओस की बूंदों की कहानी
जो मेरे सूखे मन में नमी ला देती हैं,
मैं लिखती उन तमाम झुर्री पड़े
चेहरों की मुस्कुराहटों के बारे में
जिन्होंने मुझे बेइंतहा मोहब्बत दी,
मैं लिखती सर्दी में गरम गुड़ की चाय
और उनके मिट्टी के घरों की
आंगन की खुशबू के बारे में,
मैं लिखती कि कितनी बार
मेरे टूटे मन को
इन पहाड़ो ने जोड़ा है,
मैं लिखती बादलों की शक्ल से बुनी
मेरी कहानियां,
मैं लिखती अंगीठी की तपन के बारे में,
मैं लिखती और बस लिखती जाती…..