शंकर दत्त

बदनगड़ गधेरा अल्मोड़ा जिले के सल्ट विकास खंड में बहने वाला का एक प्रमुख गधेरा है। साल भर बहने वाला ये गधेरा गुलार गांव के निकट से प्रारम्भ हो कर मरचूला के पास रामगंगा नदी से मिल जाता है। ऊपरी क्षेत्र मे रहने वाले लोग इसे गुलार की गाड़ के नाम से पुकारते हैं, जबकि भ्याड़ी गांव से नीचे इसे बदनगड़ गधेरा कहा जाता है।
गुलार से मरचूला तक लगभग 10 छोटे बड़े रौले इस गधेरे में मिलते है। इनमे बेलू, सिगराली और देवता रौला प्रमुख है। गुलार, तया तोक, कूपी, रीठा, कायण, झालरी, हटुली, मौडा़ली, कुमी चौड, पतलू गैर, असनाडा, बहुरू गाँव, भयट मूण, पिजोली, भीता कोट बदनगड के किनारे बसे प्रमुख गाँव हैं। इन सभी गांवों के सेरे (धान के खेत) बदनगड के किनारे हैं। सन् 1990 तक लोग यहां धान उगाते थे। बाद में बहुत से परिवार क्षेत्र से पलायन कर गए और खेती धीरे-धीरे छूटती चली गई। वर्तमान में सिर्फ कुमी चौड के सेरों में लोग धान लगाते हैं। बाकी सब भूमि अब बंजर है।
करीब सन् 1985 तक बदनगड़ पर दो घट (पनचक्की) भी चलते थे। एक पटुली गैर का ध्यानी घट और दूसरा पुनरों घट। पुनरों घट से पहले बंदराण गांव के लिए सिंचाई गूल जाती थी। पेंट (पैदल समान के लिए बाजार जाना) के दौरान इस क्षेत्र से लोग मरचूला तक बदनगड के किनारे-किनारे पैदल जाते थे। ध्यानी घट और पुनरों घट विश्राम करने की जगहें थी। पूर्व में बरसात मे बदनगड़ में पानी खूब बढ़ जाता था, रास्ते बंद हो जाते थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्व में चमड सिंह जी, जिनकी मरचूला मे दुकान थी, हर बरसात के बाद बदनगड मे ठपकनी (पानी मे बड़े पत्थर लगाना जिससे की लोग एक पत्थर से कूद कर दूसरे पत्थर पर जा सकें और गधेरे को पार करें) बनाते थे। पूरे क्षेत्र की राशन की दुकान भी मरचूला में ही थी और रास्ता बदनगड के किनारे-किनारे ही था।
बदनगड गधेरे में बहुत से घाट भी हैं। कोई भी रौला जहां पर बदनगड़ से मिलता है, उन जगहों पर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा घाट बनाये गए हैं। वर्तमान में बदनगड पर 4 घाट और 6 मंदिर है। बहुत पुराने समय से ही नदी किनारे बसे गांव के लोग बदनगड मे मछली पकड़ने जाते हैं। जानवरों को चराने के लिए लगभग सभी लोग बदनगड के किनारे ही जाते हैंे। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है की पहले हम यहाँ से मरचूला तक बदनगड़ के पानी के साथ दौड़ लगाते थे। खेल होता था कौन पहले पहुंचता है। गर्मियों मे दिन भर बदनगड़ मे नहाते रहते थे। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है की पिछले 15 सालों मे बदनगड़ मे पानी कम होता जा रहा है। कुछ रौले तो बिल्कुल सूख गए हैं।
श्रमयोग, रचनात्मक महिला मंच के साथ मिलकर बदनगड़ गधेरे के संरक्षण कार्यों को प्रारम्भ कर रहा है। इसके लिए फरवरी माह में बदनगड के हालतों की जाँच के लिए डब्ल्यू0डब्ल्यू0एफ0 के तकनीकि सहयोग से एक कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। उसके बाद बदनगड से मिलने वाले रौलों के कैचमेंट क्षेत्रों में उपचार कार्यों के लिए दीर्घ कालीन योजना बनाई जाएगी।